1 मार्च चेक बाउंस हुआ तो जेल पक्की – जानें सुप्रीम कोर्ट का नया कानून | Cheque Bounce Law

By gaurav

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भारत में आज भी बड़े लेन-देन के लिए चेक एक भरोसेमंद माध्यम माना जाता है। व्यापार, प्रॉपर्टी डील, लोन भुगतान और कई अन्य आर्थिक लेन-देन में लोग चेक का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि यह भुगतान का लिखित प्रमाण भी देता है। लेकिन जब बैंक खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं होता या चेक से जुड़ी तकनीकी गलती हो जाती है, तो बैंक उस चेक को अस्वीकार कर देता है जिसे आम भाषा में चेक बाउंस कहा जाता है।

चेक बाउंस केवल एक वित्तीय समस्या नहीं बल्कि कई मामलों में यह कानूनी विवाद का कारण भी बन जाता है। भारतीय कानून में इसके लिए स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं और दोषी पाए जाने पर सख्त सजा भी हो सकती है। हाल के समय में चेक बाउंस के मामलों को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं कि कब यह अपराध बनता है, किन परिस्थितियों में जेल हो सकती है और पीड़ित व्यक्ति को क्या कानूनी कदम उठाने चाहिए।

चेक बाउंस क्या होता है और इसके मुख्य कारण

जब कोई व्यक्ति किसी को भुगतान करने के लिए चेक देता है और वह चेक बैंक में जमा करने पर पास नहीं होता, तो इस स्थिति को चेक बाउंस कहा जाता है। बैंक उस चेक को अस्वीकार करके एक दस्तावेज जारी करता है जिसे रिटर्न मेमो कहा जाता है। इस मेमो में साफ लिखा होता है कि चेक क्यों अस्वीकार किया गया। यह दस्तावेज आगे होने वाली कानूनी प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण सबूत माना जाता है।

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चेक बाउंस होने के कई कारण हो सकते हैं। सबसे सामान्य कारण खाते में पर्याप्त धनराशि का न होना है। इसके अलावा गलत हस्ताक्षर, ओवरराइटिंग, चेक की तारीख गलत होना, चेक की वैधता समाप्त हो जाना या खाता बंद होना भी इसके कारण बन सकते हैं। कई बार लोग जानबूझकर बिना बैलेंस के चेक जारी कर देते हैं, जिससे सामने वाले व्यक्ति को आर्थिक नुकसान होता है और मामला कानूनी विवाद तक पहुंच जाता है।

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 क्या कहती है

भारत में चेक बाउंस से जुड़े मामलों को परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसा चेक जारी करता है जो बैंक में पास नहीं हो पाता, तो इसे आपराधिक अपराध माना जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग बिना बैलेंस के चेक जारी करके दूसरों को धोखा न दें।

धारा 138 के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को सजा दी जा सकती है। कानून के अनुसार अधिकतम दो साल तक की जेल या चेक राशि के दोगुने तक जुर्माना लगाया जा सकता है। कई मामलों में अदालत दोनों सजा एक साथ भी दे सकती है। हालांकि हर मामले में अदालत परिस्थितियों और सबूतों के आधार पर फैसला करती है इसलिए प्रत्येक केस का परिणाम अलग हो सकता है।

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चेक बाउंस होने पर कानूनी कार्रवाई कैसे शुरू करें

अगर किसी व्यक्ति का चेक बाउंस हो जाता है तो सबसे पहले बैंक से रिटर्न मेमो प्राप्त करना जरूरी होता है। यह दस्तावेज इस बात का आधिकारिक प्रमाण होता है कि चेक पास नहीं हुआ। रिटर्न मेमो मिलने के बाद पीड़ित व्यक्ति को कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया शुरू करनी होती है ताकि वह अपने पैसे की वसूली के लिए कानूनी कदम उठा सके।

कानून के अनुसार रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिनों के भीतर आरोपी व्यक्ति को रजिस्टर्ड डाक के माध्यम से कानूनी नोटिस भेजना होता है। इस नोटिस में साफ लिखा जाता है कि चेक बाउंस हो गया है और भुगतान किया जाए। नोटिस मिलने के बाद आरोपी को 15 दिन का समय दिया जाता है। यदि इस अवधि में भुगतान नहीं किया जाता, तो पीड़ित व्यक्ति अदालत में मामला दर्ज करा सकता है।

मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया

यदि नोटिस भेजने के बाद भी आरोपी व्यक्ति भुगतान नहीं करता, तो पीड़ित व्यक्ति मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज कर सकता है। यह शिकायत नोटिस की समय सीमा समाप्त होने के एक महीने के भीतर दर्ज करनी होती है। अदालत में शिकायत के साथ चेक की कॉपी, रिटर्न मेमो, नोटिस की कॉपी और डाक की रसीद जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं।

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कोर्ट इन दस्तावेजों की जांच करने के बाद आरोपी को नोटिस जारी कर सकती है और सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होती है। कई मामलों में अदालत समझौते का मौका भी देती है ताकि दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद खत्म कर सकें। लेकिन यदि आरोपी दोषी पाया जाता है तो अदालत कानून के अनुसार सजा और जुर्माना दोनों तय कर सकती है।

चेक जारी करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

चेक जारी करते समय कुछ सावधानियां अपनाकर चेक बाउंस जैसी समस्या से बचा जा सकता है। सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके बैंक खाते में पर्याप्त राशि उपलब्ध हो। इसके अलावा चेक पर सही हस्ताक्षर करना और तारीख सही तरीके से लिखना भी बेहद जरूरी है। छोटी सी गलती भी कई बार चेक अस्वीकार होने का कारण बन सकती है।

चेक भरते समय ओवरराइटिंग से बचना चाहिए और यदि कोई गलती हो जाए तो नया चेक जारी करना बेहतर माना जाता है। साथ ही चेक देते समय लेन-देन का स्पष्ट रिकॉर्ड रखना भी जरूरी है। इससे भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में आपके पास पर्याप्त सबूत मौजूद रहते हैं और कानूनी प्रक्रिया आसान हो जाती है।

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Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी देने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी प्रकार की कानूनी सलाह नहीं है। चेक बाउंस या किसी भी वित्तीय विवाद से जुड़े मामलों में सही निर्णय लेने के लिए हमेशा किसी योग्य वकील या कानूनी विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

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